विक्रम - बेताल की कहानी का क्या है सच ? .What is the truth of the story of Vikram-Betal ?
विक्रम - बेताल की कहानी का क्या है सच ?
| vikram aur betal |
यह कहानी सच है। क्योंकि इस कहानी का साक्ष रामानंद द्वारा बनाये गए सेरियल और कई ग्रंथो में मिलता है। जिन्हे कई रचित की गयी ग्रंथो में साक्ष मिले है । साथ ही बताउगा की कौन थे। राजा विक्रम और वह उस भयानक बेताल जिसके मुख से खून टपकता हुआ बेताल को लाने क्यों वह उस जंगल में चले गए थे। प्राचीन काल में जो एक धारा नाम की नगरी में एक आदर्श राजा विक्रम रहा करते थे। कहा जाता है की वह अपने शौर्य पराक्रम और साहस के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध थे। ऐसा भी कहा जाता है की राजा विक्रम अपनी प्रजा के जीवन के सुख के दुःख जानने के लिए रात में भेष बदल कर घूमा करते थे। वे बड़े ही दयालू किस्म के राजा थे। वह दुखियों का दुःख भी दूर किया करते थे। महाराज विक्रम और बेताल के किस्सों पर बहुत सारे ग्रन्थ भी रचे गए है।
महाराज विक्रमादित्य और बेताल के किस्सों पर छपी बेताल पच्चीसी किसी सिंघासन बत्तीसी नाम के ग्रन्थ आज भी प्रसिद्ध और लोकप्रिय है कहा जाता है की बेताल पच्चीसी को कवि सोमदेव भट्ट जिन्हे बेताल भट्ट के नाम से भी जाना जाता था।
उन्होंने इसे आज से पच्चीस सौ वर्ष पहले इसे रचित किया था। वे राजा विक्रमादित्य के नौ रत्नो में से एक थे। कहा जाता है की महाराज विक्रमदित्य ने बेताल को पच्चीस बार पेड़ से उतार कर ले जाने की कोशिश की थी। और बेताल ने हर बार रास्ते में महाराज को एक नई कहानी सुनाई थी। भले ही यह आप लोंगो को यह एक कहानी लगे। पर महाराज विक्रमदित्य का राज्य एक समय में भारत देश में जरूर हुआ करता था। इन्ही के नाम से विक्रामिसावंत मनाया जाता है .
महान पराक्रमी राजा विक्रम का इतिहास मिटाने की पूरी कोशिश की गयी। विदेशी आक्रमण कारीओं के द्वारा क्योंकि महाराज विक्रम के बारे में भारतियों को पता न लग पाए। इसलिए उनके कई सारे सबूतों को मिटा दिया गया। पर आज भी ऐसे कई कई दास्तालेप और प्राचीन हस्तलिपियाँ मिलती है जिनमे महाराज विक्रमदित्य के बारे में वर्णन मिलता है। और आज हम आपको बताते है की कौन थे महाराज विक्रमादित्य और बेताल। कहा जाता है एक समय में एक दुष्ट तांत्रिक अपनी शैतानी शक्तियों को बढ़ाने के लिए एक अनुष्ठान करता है जिसको पूरा करने के लिए बत्तीस लक्षण वाले ब्राह्मण पुत्र की बलि देने की आवश्यकता पड़ती है। वह तांत्रिक एक ऐसे ही बच्चे की तलाश करता है और उसे ऐसा ही एक बच्चा मिल भी जाता है। वह तांत्रिक उस ब्राह्मण के बच्चे की बलि देने के लिए उसका पीछा करता है वह बच्चा बचाओ करते हुए एक घने जंगल में प्रवेश कर जाता है।
जंगल में उस बच्चे को एक प्रेत मिलता है। और वह बच्चा उस प्रेत को अपनी आप - बीती बताता है। प्रेत को उस बालक पर दया आती है। वह प्रेत उसको बचने के लिए कुछ शक्तियां देता है और कहता है की अगर वह जंगल में किसी वृक्ष पर लटक जायगा तो वह तांत्रिक उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। और वही बालक बेताल होता है उस प्रेत द्वारा उस बालक की मदद करने की वजह से वह तांत्रिक उस बच्चे को मार नहीं पाता है। इस वजह से उस दुष्ट तांत्रिक का अनुष्ठान अधूरा रह जाता है। अपने प्रतिष्ठान को पूरा करने के लिए। वह दुष्ट तांत्रिक फिर एक जाल रचता है। और महाराज विक्रम के पराक्रम के शौर्य गाथाओं को सुनकर अपना काम निकलवाने के लिए एक ऐसा जाल बनाता है।
जिस जाल में महाराज विक्रमदित्य फस जाते है और जब भी महाराज विक्रमसिंघ से मिलने आता है तो हमेशा एक फल लेकर ही आता है उस फल के अंदर एक कीमती रत्न होता है। उसका भेद पता लगाने के लिए महाराज विक्रमादित्य उस साधु की खोज करते हैं। अंतः महाराज विक्रमादित्य उस साधु को ढूंढ लेते है। वह दुष्ट तांत्रिक महाराज को अपने विश्वास में ले लेता है। और महाराज बिना उसकी मनसा जाने बेताल को लाने चले जाते हैं। क्योंकि वह तांत्रिक महात्मा के भेष में होता है। और महाराज को उस बेताल को लेने चले जाते है। क्योंकि वह तांत्रिक महाराज से बेताल को लाने के लिए कहता है। महाराज जब उस पेड़ पर जाते हैं जंहा बेताल होता है तो महाराज बेताल को अपने साथ चलने को कहता है।
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विक्रम बेताल का क्या परिणाम है?
इस पर बेताल महाराज के सामने एक शर्त रखता है। बेताल कहता है की मैं तुम्हे एक कहानी सुनाऊंगा , कहानी सुनने के बाद में तुमसे एक प्रश्न करूँगा ? अगर तुमने उस प्रश्न सही जवाब नहीं दिया तो मैं तुम्हे मार डालूंगा। अगर तुमने सही उत्तर दे दिया। तो मैं तुम्हे तुम्हे छोड़ कर दुबारा उस पेड़ पर लटक जाऊंगा। बेताल द्वारा सुनाई गयी। इन्ही कहांनियों को विक्रम - बेताल की कहानियां कहा जाता है। बेताल ने यात्रा के दौरान पच्चीस कहानियां सुनाई थी। अब आप लोग यह सोचते होंगे की आखिरी कहानी में क्या होता है और इसका अंत कैसे होता है। चलिए हम बताते है आपको, जब राजा बेताल के साथ उस योगी के पास जाते हैं। तो वह दुष्ट योगी राजा विक्रम और बेताल को एक साथ देख कर बहुत खुश होता है। और राजा को खूब धन्यवाद देता है। वह यह भी बोलता है की महाराज आप सभी में श्र्ष्ठ हो इतना कह कर वह बेताल को महाराज के कंधे से उतार लेता है और बेताल को स्नान करा कर फूल - मालाओं से सुसज्जित करके अनुष्ठान के जगह पर रख देता है। अपने अनुष्ठान के दौरान वह महाराज विक्रम दित्य से सर झुका कर प्रणाम करने को कहता है। पर राजा को उस बेताल की एक बात याद आ जाती है जो उसने पच्चीसवीं कहानी में बताई थी।
तो राजा विक्रम कहता है की मैं राजा हूँ मैंने आज तक किसी के सामने सर नहीं झुकाया जिसकी वजह से मैं नहीं जनता। तो आप पहले सर झुका कर मुझे दिखाइए। फिर राजा अपनी तलवार से उस दुष्ट तांत्रिक का सर काट देता है। कुछ अंतिम कहानी ही कुछ ऐसी होती है की महाराज विक्रम को सब पता चल जाता है और महाराज उस दुष्ट साधु को मार देते है। कहा जाता है की तभी बेताल खुश होकर उन्हें धरती और पाताल का राजा और चौबीस सिद्धिया प्रदान कर देता है और साथ में ही उसे वर मांगने को कहता है जिससे राजा ने बेताल द्वारा सुनाई गयी कहानियों को प्रशिद्ध होने का वर मांगता है ,उसी वर की वजह से उनकी यह कहानी आज भी हम लोग बहुत ही प्यार से पढ़ते और सुनते है। इस कहानी या धरा नगरी के होने के कई साबुत आज भी सरकार के पास सुरक्षित है।
राजा विक्रम की कहानी का क्या है अंत ?
कहते है की जब बेताल ने राजा को वरदान दे दिया। तब शिव जी खुद राजा के सामने प्रकट होकर उनको आशीर्वाद दिया की , हे राजा आप जल्द ही इस संसार के राजा बन जायँगे और अंत में आप मेरे अंदर ही समां जायँगे। फिर राजा अपना सारा काम खत्म कर के अपने राज्य वापस पहुँचता है और जल्द ही वह , पृथ्वी सहित पाताल का भी राजा बन जाता है। उन्हों ने अपने परिवार के साथ कई वर्षो तक राज्य किया। एक बार कहते है की देवताओं और कुछ बुरी शक्तियों का युद्ध भी छिड़ गया। जो राजा विक्रम ने ही दोनों तरफ की बातो को समझ कर उस युद्ध का निर्णय लिया। राजा विक्रम को आकाश पाताल हर जगह जाने की अनुमति थी। राजा का स्वमं देवराज इंद्र भी सम्मान करते थे। कहते है की कुछ बुरा भविष्य देख कर उन्होंने शिव जी के वरदान स्वरुप , उनमे समां गए थे।
jai ho
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