( विक्रम - बेताल ) पार्ट - 17 , 18 . 19 . 20 . 21 . 22 .23 . 24 . 25 कहानी हिंदी में ,( vikram betal ) story in hindi part - 17 . 18 .19 .20 . 21 . 22 . 23 . 24 . 25

vikram - betal


भाग 17 
अधिक साहसी कौन ?


चंद्रशेखर नगर में एक रत्नदत्त नाम का सेठ रहता था। उसके एक लड़की थी। उसका नाम उन्मादिति था। जब वह लड़की हुई तो रत्नदत्त ने राजा  पास जाकर कहा की अगर आप चाहे तो मेरी बेटी से विवाह कर लीजिये। राजा ने तीन दासियों को लड़की को देखने के लिए भेजा।  उन्होंने उन्मादिति को देखा तो उसके रूप पर वह मुग्ध हो गयी , लेकिन उन्होंने यह सोचकर राजा को उल्टा बता दिया की कहीं राजा उसके वश में न हो जाये और राज्य की दुर्दशा हो जाये इसलिए , उन्होंने आकर कह दिया की वह तो कुलक्षणी है।  राजा ने सेठ को मना कर दिया। 

इसके बाद सेठ ने उसकी शादी राजा के सेनापति बलभद्र के साथ कर दिया। वे दोनों अच्छे से रहने लगे। 


एक दिन राजा की सवारी उस रास्ते से निकली। जंहा सेनापति का घर था। उस समय उन्मादिति अपने कोठे पर खड़ी थी। राजा की निगाह उस पर पड़ी तो वह उस पर मोहित हो गया। उसने पता लगाया।  मालूम हुआ की वह सेठ की लड़की है। राजा ने सोचा की हो न हो जिन दसियों को मैंने देखने भेजा था , उन्होंने छल किया मेरे साथ। 
राजा ने उन्हें बुलाया तो उन्होंने आकर सारी बात सच -सच कह दिया। इतने में सेनापति वहां आ गया।  उसे राजा की बेचैनी मालूम हुई।  उसने कहा , स्वामी उन्मादिति को आप ले लीजिये।  राजा ने गुस्सा होकर कहा , क्या  मैं अधर्मी हूँ। जो पराई स्त्री को ले लूँ ?

राजा को इतनी व्याकुलता हुई की वह कुछ दिन में मर गया।  सेनापति ने अपने गुरु को सब हाल सुनकर पूछा की अब  मैं क्या करूँ ? गुरु ने कहा , सेवक का धर्म है की स्वामी के लिए जान दे  दे। 

राजा की चिता तैयार हुई। सेनापति वंहा गया और उसमे कूद पड़ा।  जब उन्मादिति को यह मालूम हुई तो वह पति के साथ  जल जाना धर्म समझा वह भी चिता के अंदर प्रवेश कर गयी और जलकर भस्म हो गयी।  

इतना कह कर बेताल बोला , हे राजन , बताओ सेनापति और राजा में कौन अधिक साहसी था ?

राजा ने कहा , राजा अधिक साहसी था क्योंकि उसने राजधर्म पर दृढ रहने के लिए उन्मादिति को उसके पति के कहने पर भी स्वीकार नहीं किया और अपने प्राणो को त्याग दिया।  सेनापति कुलीन सेवक था।  अपने स्वामी की भलाई में उसका प्राण देना अचरज  की बात नहीं।  असली काम तो राजा ने किया की प्राण छोड़कर भी राजधर्म नहीं  छोड़ा। "

राजा का उत्तर सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका।  राजा फिर उसके पास गया और पकड़ कर लाया तब उसने यह कहानी सुनाई।  







पार्ट - 18 
बालक क्यों हँसा ?


चित्रकूट नगर में एक राजा रहता था।  एक दिन वह शिकार खेलने जंगल गया।  घुमते -घुमते वह रास्ता भूल गया और अकेला रह गया।  थक कर वह एक पेड़ के नीचे लेट गया। अचानक उसे एक ऋषि -कन्या दिखाई दी।  उसे देख कर  राजा मोहित हो गया।  थोड़ी देर में ऋषि स्वमं आ गया।  ऋषि ने पूछा तुम यहाँ कैसे आये हो ? राजा ने   कहा मैं शिकार खेलने आया हूँ। ऋषि बोले , बेटा ,तुम क्यों जीवो को मार कर पाप कमाते हो ?

राजा ने वादा किया की मैं अब कभी शिकार नहीं खेलूंगा। खुश होकर ऋषि ने कहा , तुम्हे जो मांगना हो , मांग लो। 

राजा ने ऋषि कन्या मांगी और ऋषि ने खुश होकर दोनों का विवाह करा दिया। राजा जब उसे लेकर चला तो रस्ते में उसे  भयंकर राक्षस मिला।  बोला , मैं तुम्हारी रानी को खाऊंगा अगर चाहते हो की वह बच जाये तो सात दिन के भीतर एक ऐसे ब्राह्मण पुत्र का बलिदान करो , जो अपनी इच्छा से अपने आपको दे और उसके माता -पिता उसे मारते समय उसके हाथ -पैर पकडे हो। डर के मारे राजा ने उसकी बात मान ली।  वह अपने नगर लौटा और अपने दीवान को  सब हाल कह सुनाया।  दीवान ने कहा , आप परेशान न हों , मैं उपाय करता हूँ। 

इसके बाद  दीवान ने सात बरष के बालक की मूर्ति बनवायी और उसे कीमती गहने पहना कर नगर -नगर और गांव - गांव घुमवाया।  यह कहलवा दिया की जो कोइ सात वर्ष के ब्राह्मण का बालक अपने को बलिदान के लिए देगा और बलिदान के समय उसके माँ बाप उसके हाथ पैर पकड़ेंगे , उसी को यह मूर्ति और सौ गांव मिलेंगे। 

यह खबर सुनकर एक ब्राह्मण बालक राजी हो गया। उसने माँ - बाप से कहा , आपको बहुत से पुत्र मिल जायँगे , मेरे शरीर से राजा की भलाई होगी और गरीबी मिट जायगी। 

माँ - बाप ने ,मना किया , पर बालक ने हट करके उन्हें राजी कर लिया।  माँ - बाप और बालक को लेकर राजा के पास गए।  राजा उन्हें राक्षस के पास ले गया। राक्षस के सामने माँ - बाप ने बालक के हाथ - पैर पकडे और राजा उसे तलवार से मारने को तैयार हुआ।  उसी समय बालक बड़े जोर से हँस पड़ा। 

इतना कह कर बेताल बोला , हे राजन , यह बताओ की वह बालक क्यों हँसाा ? 


राजा ने फ़ौरन उत्तर दिया , इसलिए की डर के समय आदमी रक्षा के लिए अपने माँ - बाप को पुकारता है। माता - पिता न हो तो  राजा पीड़ितों की मदद करता है। पर यंहा तो कोइ भी बालक के साथ नहीं था।  माँ - बाप हाथ पकडे हुए थे , राजा तलवार लिए खड़ा था और राक्षस भक्षक हो रहा था।  ब्राह्मण का लड़का परोपकार के लिए अपना शरीर दे रहा था।  इसी हर्ष और अचरज से वह हँसा। 


इतना सुनकर बेताल गायब हो गया और राजा लौटकर फिर उसे ले आया।  रास्ते में बेताल  फिर एक कहानी शुरू कर दी। 





पार्ट - 19 
विद्या क्यों नष्ट हो गयी ?


उज्जैन नगरी में महासेन नाम का राजा राज करता था। उसके में वासुदेव शर्मा नाम का एक ब्राह्मण रहता था। जिसके गुणकारी नाम का बेटा था।  गुणाकारी बड़ा जुआरी था। वह अपने माता -पिता का सारा धन जुए में हार गया।  ब्राह्मण ने गुस्से में आकर उसे घर से निकाल दिया।  वह दूसरे नगर  पहुंचा।  वहां उसे एक योगी मिला।  उसे हैरान देख कर उसका कारन पूछा तो उसने सब बता दिया। योगी ने कहा , लो , पहले कुछ खा लो।  गुणाकर ने जवाब  दिया , मैं ब्राह्मण का बेटा हूँ।  आपकी भिक्षा कैसे खा सकता हूँ ?

इतना सुनकर योगी ने सिद्धि को याद किया।  वह आयी।  योगी ने उससे आवभगत करने को कहा।  सिद्धि ने एक सोने का महल बनवाया और गुणाकर उसमे रात अच्छी तरह से रहा। सबेरे उठते ही उसने देखा की महल आदि कुछ भी नहीं है।  उसने योगी से कहा , महाराज , उस स्त्री के बिना अब मैं नहीं रह सकता। 

योगी ने कहा , वह तुम्हे एक विद्या प्राप्त करने से मिलेगी और वह विध्या जल के अंदर खड़े होकर मंत्र जपने से मिलेगी।  लेकिन जब वह लड़की तुम्हे मेरी सिद्धी से मिल सकती है तो तुम विद्या प्राप्त करके क्या करोगे ?

गुणाकर  ने कहा , नहीं , मैं स्वमं वैसा करूँगा।  योगी बोला , कहीं ऐसा न हो की तुम विद्या प्राप्त न कर  पाओ और  मेरी सिद्धि भी नष्ट हो जाये। 

पर गुणकर नहीं माना।  योगी ने उसे नदी के किनारे ले  जाकर मंत्र  बता दिए और कहा की जब तुम जप करते हुए माया  से मोहित होने लगे तो मैं तुम पर अपनी विद्या का प्रयोग करूँगा , उस समय तुम अग्नि में प्रवेश कर 
जाना 

गुणाकर जप करने लगा।  जब वह माया के एक दम वश हो गया तो वह देखता क्या है की वह किसी ब्राह्मण के बेटे के रूप में पैदा हुआ है।  उसका ब्याह हो गया , और उसके बाल बच्चे भी हो गए है।  वह अपने जन्म की बात भूल गया।  तभी योगी ने अपनी विद्या का प्रयोग किया।  गुणाकर मायारहित होकर अग्नि में प्रवेश करने को तैयार हुआ। उसी समय उसने देखा की उसे मरता देख उसके माँ -  बाप और दूसरे लोग रो रहे हैं और उसे आग में प्रवेश करने से रोक रहे है गुणाकार ने सोचा की मेरे मरने से यह सारे मर जायँगे और पता नहीं  योगी की बात सच हो या न हो। 

इस तरह सोचता हुआ वह आग में पघुसा तो आग ठंडी हो गयी और माया भी शांत हो गयी।  गुणाकर चकित होकर योगी के पास आया और उसने सारा हाल बता दिया। 

योगी ने कहा , मालूम होता है की तुम्हारे करने में कोई कसर रह गयी। 

योगी ने स्वमं सिद्धि को याद की , पर वह नहीं आई।  इस तरह योगी और गुणाकर दोनों की विद्या नष्ट हो गयी। 

इतनी कथा कहकर बेताल ने पूछा , हे राजन , यह बताओ की दोनों की विद्या क्यों नष्ट हो गयी ?

राजा बोला , इसका जवाब साफ है।  निर्मल और शुद्ध संकल्प करने से सिद्धि प्राप्त होती है।  गुणाकर के दिल में शंका हुई की पता नहीं , योगी की बात सच होगी या नहीं।  योगी की विद्या इसलिए नष्ट हुई  उसने अपात्र को विद्या दी। 

राजा का उत्तर सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। राजा वंहा गया और उसे लेकर चला तो उसने एक और कहानी सुनाई। 





पार्ट -२० 
पिण्डदान का अधिकारी कौन 




वक्रोलक  नामक नगर में सूर्यप्रभ नाम का राजा राज करता था।  उसके कोइ संतान न थी।  उसी समय में एक दूसरी नगरी में  एक धनपाल नाम का साहूकार रहता था।  उसकी स्त्री का नाम हिरण्यवती था और उसके धनवती नाम की एक पुत्री थी।  जब धनवती बड़ी हुई तो धनपाल मर गया और उसके नाते -रिस्तेदारो ने उसका धन ले लिया।  हिरण्यवती अपनी लड़की को लेकर रात के समय नगर छोड़ कर चल दी। रास्ते में एक चोर सूली पर लटकता हुआ मिला।  वह मरा नहीं था।  उसने हिरण्यवती को देखकर अपना परिचय दिया और कहा , मैं तुम्हे एक हजार  अशर्फियाँ दूंगा। अगर तुम अपनी लड़की का ब्याह मेरे साथ कर दोगी। 

हिरण्यवती ने कहा , तुम मरने वाले हो। 

 चोर बोला , मेरे कोइ पुत्र नहीं हैं।  और निपूते की परलोक में सद्गति नहीं होती है।  अगर मेरी आज्ञा से और किसी से  भी पुत्र पैदा हो जायगा तो मुझे  सद्गति मिल जायगी। "

हिरण्यवती ने  लोभ के वश होकर उसकी बात मान ली और धनवती का ब्याह उसके साथ कर दिया।  चोर बोला , इस बड् के पेड़ के नीचे अशर्फियाँ गड़ी हैं , सो ले लेना और मेरे प्राण निकलने पर मेरा क्रिया कर्म करके तुम अपनी बेटी  के साथ अपने नगर में चली जाना। 

इतना कह कर चोर मर गया।  हिरण्यवती ने जमीन खोदकर अशर्फियाँ निकली , चोर का क्रिया कर्म किया और अपने नगर में  लौट आयी। 

उसी नगर में वसुदत्त नाम का  था , जिसके  मनस्वामी नाम का शिष्य था।  वह शिष्य एक वेश्या  से प्रेम करता था।  वेश्या उससे पांच सौ अशर्फिया मांगती थी।  वह कहाँ से लेकर देता।  संयोग से धनवती ने मनस्वामी को देखा और वह उसे चाहने लगी।  उसने अपनी दासी को उसके पास भेजा।  मनस्वामी ने कहा  की मुझे पांच सौ अशर्फियाँ मिल जाये तो मैं एक रात धनवती के साथ रह सकता हूँ।  

हिंरण्यवती राजी हो गयी।  उसने मनस्वामी को पांच सौ अशर्फियाँ दे दी।  बाद में धनवती के एक पुत्र उत्पन्न हुआ।  उसी रात शिवजी ने सपने में उन्हें दर्शन देकर कहा , तुम इस बालक को हजार अशर्फियाँ के साथ राजा के महल के दरवाजे पर रख आओ। 

माँ -बेटी ने ऐसा ही किया।  उधर शिवजी ने राजा को सपने में दर्शन देकर कहा , तुम्हारे द्वार पर किसी ने धन के साथ  लड़का रख दिया है , उसे ग्रहण करो। 

राजा ने अपने नौकरो को भेजकर बालक और अशर्फियाँ को माँगा लिया।  बालक ,का नाम चन्दप्रभ रखा।  जब वह  लड़का बड़ा हुआ तो उसे गद्दी सौपकर राजा काशी चला गया और कुछ दिन बाद मर गया।  

पिता के ऋण के उऋण होने के लिए चन्द्रप्रभ  तीर्थ करने निकला।  जब वह घुमते हुए गयाकूप पहुँचा और पिंडदान किया तो  उसमे से तीन हाथ एक साथ निकले।  चन्द्रप्रभ ने चकित होकर ब्राह्मणो से पूछा की किसको पिंड दूँ ?उन्होंने कहा , लोहे की कीलवाला चोर का हाथ है।  पवित्रीवाला ब्राह्मण का है और अँगूठीवाला राजा का।  आप तय करो  की किसको देना है ?

इतना कह कर बेताल बोला , राजन तुम बताओ की उसे पिंड किसको देना चाहिए ?

राजा ने कहा, चोर को क्योंकि उसी का वह पुत्र था।  मनस्वामी उसका पिता इसलिए नहीं हो सकता की वह तो एक रात के लिए  पैसे से खरीदा हुआ था।  राजा भी उसका पिता नहीं हो सकता , क्योंकि उसे बालक को पालने के लिए धन मिल गया था।  इसलिए चोर ही पिंड का अधिकारी है।  

इतना सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका और राजा को वहां जाकर उसे लाना पड़ा। रास्ते में फिर उसने एक और कहानी  सुनाई। 






पार्ट - 21 
सबसे ज्यादा प्रेम में अँधा कौन था ?






विशाला नाम की नगरी में पद्मनाभ नाम का राजा राज करता था।  उसी नगर में अर्थदत्त नाम का एक साहूकार रहता था।  अर्थदत्त के अनंगमंजरी  नाम की एक सुन्दर कन्या थी।  उसका विवाह साहूकार ने एक धनी साहूकार के  पुत्र मणिवर्मा के साथ कर दिया। मणिवर्मा पत्नी को बहुत चाहता था , पर पत्नी उसे प्यार नहीं करती थी।  एक बार मणिवर्मा कंही बाहर गया। पीछे अनंगमंजरी की राजपुरोहित के लड़के कमलाकर पर निगाह पड़ी तो वह उसे चाहने लगी।  पुरोहित का लड़का भी उस लड़की को चाहने लगा।  अनंगमंजरी ने महल के बाग़ में जाकर चंडीदेवी को प्रणाम कर कहा , यदि मुझे इस जन्म में कमलाकर पति के रूप में मिले तो अगले जन्म में जरूर मिले। 

यह कहकर वह अशोक के पेड़ से दुप्पटा कीफांसी बनाकर मरने  को तैयार हो गयी। तभी उसकी सखी आ गयी और उसे यह वचन देकर ले गयी की कमलाकर से  उसे मिला देगी।  दासी सबेरे कमलाकर के यंहा गयी और दोनों के बगीचे में मिलने का  प्रबंध कर आयी। 

कमलाकर आया और उसने अनंगमंजरी को देखा।  वह बेताब होकर मिलने के लिए दौड़ा।  मारे ख़ुशी के अनंगमंजरी के ह्रदय की  गति रुक गयी और वह मर गयी।  उसे मरा देख कर कमलाकर का भी दिल फट गया 
और वह भी मर गया।  उसी समय मणिवर्मा भी आ गया और अपनी स्त्री को पराये आदमी के साथ मरा  देखकर बड़ा दुखी हुआ।  वह स्त्री को इतना चाहता था की उसका वियोग न सहने से उसके भी प्राण निकल गए।  चारों ओर हाहाकार मच गया। चंडीदेवी प्रकट हुई और उसने सबको जीवित कर दिया। 

इतना कहकर बेताल बोला , राजन , यह बताओ की इन तीनो में सबसे ज्यादा विराग में कौन अँधा था ?

राजा ने कहा , मेरे विचार से मणिवर्मा था , क्योंकि वह अपनी पत्नी को पराये आदमी को प्यार करते देखकर भी शोक में मर  गया।  अनंगमंजरी और कमलाकर तो अचानक मिलने की ख़ुशी से मरे थे।  उसमे अचरज की बात कोइ  नहीं थी। 

राजा का यह जवाब सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा ;लटका और राजा को उसे वापस लाना पड़ा। रास्ते में उसने फिर  एक कहानी सुनाई। 





पार्ट - 22 
शेर बनाने का अपराध किसने किया ?




कुसुमपुर नगर में एक राजा राज्य करता था।  उसके नगर में एक ब्राह्मण था।  उसके चार बेटे थे।  लड़को के सयाने होने पर ब्राह्मण मर गया और ब्राह्मणी उसके साथ सती हो गयी।  उनके रिस्तेदारो ने उनका धन चीन लिया।  वे चारों भाई नाना के यंहा चले गए।  लेकिन कुछ दिनों बाद वहां भी उनके साथ बुरा व्यवहार होने लगा।  तब सबने मिल कर सोचा की कोई विद्या सीखनी चाहिए।  यह सोच कर के चारो दिशाओ में चल दिए। 

कुछ समय बाद वे विद्या सीख कर मिले।  एक ने कहा , मैंने ऐसी विद्या सीखी है की मैं मरे हुए प्राणी की हड्डियों पर मॉस चढ़ा सकता हूँ।  दूसरे ने कहा , मैं उसके खाल और बाल पैदा कर सकता हूँ , तीसरे ने कहा , मैं उसके सारे अंग बना सकता हूँ।  चौथा बोला , मैं उसमे जान डाल सकता हूँ। 

फिर वे अपनी विद्या की परीक्षा लेने एक जंगल में गए।  वहां उन्हें एक मरे हुए शेर की हड्डिया मिली। उन्होंने बिना पहचाने  उसे उठा लिया।  एक ने मास डाला , दूसरे ने खाल और बाल पैदा कर दिया।  तीसरे ने सारे अंग जोड़  दिए और चौथे ने प्राण डाल दिया। शेर जीवित हो उठा और उसने सब को खा गया। 

यह कथा सुनाकर बेताल बोला, हे राजा , यह बताओ की उन चारों में शेर बनाने का अपराध किसने किया ?

राजा विक्रम बोला , जिसने प्राण डाले उसने , क्योंकि बाकी तीन को यह पता ही नहीं था की वे शेर बना रहे है।  इसलिए  उनका कोई दोष नहीं है।  

यह सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका।  राजा जाकर फिर उसे पकड़ कर लाया। रस्ते में बेताल ने एक और नई कहानी  सुनाई। 





पार्ट - 23 
योगी पहले क्यों रोया , फिर क्यों हँसा ?




कलिंग देश में शोभावती नाम का एक नगर था। उसमे राजा प्रदुम्न राज करता था। उसी नगरी में एक ब्राह्मण रहता  था , जिसके देवसोम नाम का एक बड़ा ही योग्य पुत्र था।  जब देवसोम सोलह वर्ष का था और वह तभी ही सारी विद्या सीख चूका था लेकिन एक दिन वह मर गया।  उसके बूढ़े माँ - बाप बड़े दुखी हुए।  चारो तरफ शोक छा गया।  जब लोंग उसे शमशान में लेकर पहुंचे तो रोने - पीटने की आवाज सुनकर एक योगी अपनी कुटिया  में से बाहर निकल कर आया।  पहले तो वह खूब जोर से रोया , फिर खूब हँसा , फिर योग विद्या के बल से अपना शरीर छोड़ कर  उस लड़के के शरीर में घुस गया।  लड़का उठ खड़ा हुआ।  उसे जीता देखकर सब बड़े खुश हुए। 

वह लड़का वही तपस्या करने लगा। 

इतना कह कर बेताल बोला , हे राजन , यह बताओ की वह योगी पहले क्यों रोया , फिर क्यों हँसा ?

राजा ने कहा , इसमें क्या बात है।  वह रोया इस लिए की जिस शरीर को उसके माँ - बाप  ने पाला - पोसा और जिससे उससे उसने बहुत सी शिक्षाए प्राप्त की , उसे छोड़ रहा था।  हँसा इसलिए की वह नए शरीर में प्रवेश करके और अधिक सिद्धियां प्राप्त कर सकेगा। 

राजा का यह जवाब सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। राजा जाकर उसे लाया तो रास्ते में बेताल ने कहा , हे राजन , मुझे इस बात की बड़ी ख़ुशी है की बिना जरा - सा भी हैरान हुए तुम मेरे सवालों का जवाब देते जा रहे हो और बार  - बार आने जाने की परेशानी उठाते रहे हो।  आज मैं तुमसे एक बहुत भारी सवाल करूँगा।  सोचकर जवाब देना।  
इसके बाद बेताल ने यह कहानी सुनाई। 





पार्ट - 24 
माँ - बेटी के बच्चो में क्या   रिश्ता हुआ ?





किसी नगर में मांडलिक नाम का राजा राज करता था।  उसकी पत्नी का नाम चडवती था। उसके लावण्यवती नाम की  कन्या थी। जब वह विवाह योग्य हुई तो राजा के भाई - बन्धुओ ने उसका राज्य छीन लिया और उसे देश निकाला दे दिया। राजा - रानी और कन्या को साथ लेकर मालव देश को चल दिया।  रात में वे एक वन में ठहरे। पहले दिन  चलकर भीलो की नगरी में पहुंचे।  राजा ने रानी और बेटी से  कहा तुम लोग वन में छिप जाओ , नहीं तो भील तुमको परेशान करेंगे। वे दोनों वन में चली गयी। इसके बाद भीलों ने राजा पर हमला कर  दिया। राजा ने मुकाबला किया।  पर अंत में राजा मारा गया। भील भी चले गए। 

उसके जाने के बाद रानी और बेटी जंगल से निकलकर आयी और राजा को मरा देखकर बड़ी दुखी हुई। वे दोनों शोक करते हुए एक  तालाब के किनारे पहुंची। उसी समय वंहा चंडसिंह नाम का साहूकार अपने बेटे के साथ ,घोड़े पर चढ़ कर  शिकार खेलने के लिए उधर आया।  दो स्त्रियों के पैर के निशान देखकर साहूकार अपने बेटे से बोला , अगर ये स्त्रियां मिल जो तो जाएँ जिससे चाहो , विवाह कर लेना। 

लड़के ने कहा , छोटे पैर वाली छोटी उम्र की होगी , उससे मैं विवाह कर लूंगा। आप बड़ी से कर लें। 

 साहूकार विवाह नहीं करना चाहता था , पर बेटे के बहुत कहने पर राजी हो गया। 

थोड़ा आगे बढ़ते ही उन्हें दोनों स्त्रियां दिखाई दी।  साहूकार ने पूछा , तुम कौन हो ,?

रानी ने सारा हाल कह सुनाया। साहूकार उन्हें अपने घर ले गया। संयोग से रानी के पैर छोटे थे , पुत्री के  पैर बड़े थे। इसलिए साहूकार ने पुत्री से विवाह किया , लड़के ने रानी से हुई और इसतरह पुत्री सास बन गयी और माँ बेटे की बहु।  उन दोनों के आगे चलकर कई संताने हुई। 

इतना कह कर बेताल बोला , हे राजन बताइये , माँ - बेटी के जो बच्चे हुए , उनका आपस में क्या रिश्ता हुआ ?

यह सवाल सुनकर राजा बड़े चक्कर में पड गया।  उसने बहुत सोचा , पर जवाब न सूझा।  इसलिए वह चुपचाप  नीचे को सर झुका कर  चलता  रहा। 

बेताल यह देखकर बोला , राजन , कोई बात नहीं है।  मैं तुम्हारे  धीरज और पराक्रम से खुश हूँ।  मैं अब इस मुर्दे से निकल जाता हूँ  तुम इसे योगी के पास ले जाओ।  जब वह तुम्हे इस मुर्दे को सर झुका कर प्रणाम करने को कहे तो तुम कह देना  की पहले आप करके दिखाओ।  जब वह सर झुककर बतावे तो तुम उसका सर काट लेना।  उसका बलिदान  करके तुम सारी पृथ्वी के राजा बन जाओगे।  सर अगर नहीं काटा तो वह तुम्हारी बलि देकर सिद्धि प्राप्त करेगा।  

इतना कहकर बेताल गायब हो गया और राजा मुर्दे को लेकर योगी के पास पहुंचा। 







पार्ट - 25 
आखिरी कहानी 

योगी राजा  और मुर्दे को देख कर बहुत खश हुआ। बोला , हे राजन तुमने यह कठिन काम कर के मेरे साथ बहुत बड़ा उपकार किया  है।  तुम सचमुच सारे राजाओ में श्रेस्ट हो। 

इतना कहकर उसने मुर्दे को कंधे से उतार लिया और उसको स्नान कराकर फूलों की मालाओ से सजा कर रख दिया।  फिर मंत्र बोल कर बेताल का आवाहन करने लगा और उसकी पूजा की।  पूजा के बाद राजा उसने राजा से कहा , हे राजन , तुम शीश  झुका कर इसे प्रणाम करो। 

राजा को बेताल की याद आ गयी। उसने कहा , ,मैं राजा हूँ , मैंने कभी किसी के सामने सर नहीं झुकाया। आप पहले सर  झुका कर बता दीजिये। 

योगी ने जैसे ही सर झुकाया , राजा ने तलवार से उसका सर काट दिया। बेताल बड़ा खुश हुआ। बोला , राजन , यह योगी विद्याधरों का स्वामी बनना चाहता था। अब तुम बनोगे।  मैंने तुम्हे बहुत हैरान किया है। तुम जो चाहो सो मांग लो। 

राजा ने कहा, अगर आप खुश हैं। तो  मेरी प्राथना है की आपने जो मुझे चौबीस कहानियां सुनाई , वे और पच्चीसवीं यह , सारे संसार में प्रसिद्ध हो जाएँ। और लोग इन्हे आदर से पढ़े। 

बेताल ने कहा ऐसा ही होगा।  यह कथाएं बेताल - पच्चीसी के नाम से प्रशिद्ध होंगी और जो इन्हे पढ़ेगा उनके पाप दूर हो जायँगे। 

यह कह कर बेताल चला गया।  उसके जाने के बाद शिवजी प्रकट होकर कहा , राजन तुमने अच्छा किया , जो इस दुष्ट साधु को मार डाला।  अब तुम जल्दी ही सातों द्वीपों के और पाताल सहित सारी पृथ्वी पर अपना राज्य स्थापित करोगे। 

इसके बाद शिवजी अंतर्धान हो गए।  काम पूरे होने के बाद राजा श्मशान से अपने नगर में आ गया।  कुछ ही दिनों में वह  सारी पृथ्वी का राजा बन गया और बहुत समय तक आनंद से राज्य करते हुए अंत में भगवन शिव में समां गया। 




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