कहानी हिंदी में ( विक्रम - बेताल ) पार्ट - 14 , 15 , 16 .best story in hindi ( vikram - betal ) part - 14 , 15 , 16

चोर जोर - जोर से रोया फिर हँसा क्यों ? ( विक्रम - बेताल ) पार्ट -14 



विक्रम - बेताल 


आयोध्या नगरी में वीरकेतु नाम का राजा राज करता था।  उसके राज्य में रत्नदत्त नाम का एक साहूकार था , जिसके रत्नवती नाम की एक लड़की थी।  वह बहुत सुन्दर थी। पर वह पुरुष भेष में रहा करती थी और किसी से ब्याह नहीं करना चाहती थी। उसका पिता बड़ा दुखी था। 

इसी बीच में नगर में खूब चोरिया होने लगी।  जिससे प्रजा बहुत दुखी थी।  कोशिश करने के बाद भी जब चोर पकड़ में  नहीं आया तो राजा स्वमं उसे पकड़ने के लिए निकला।  एक दिन रात को जब राजा भेष बदलकर घूम रहा था  तो उसे परकोटे के पास एक आदमी दिखाए दिया। राजा चुप -   चाप उसके पीछे चल दिया।  चोर ने पूछा तुम कौन हो , राजा ने कहा मैं पास के गांव का एक छोटा चोर हूँ।  चोर ने कहा , तब तो तुम मेरे साथी हो।  आओ , मेरे घर चले। 

दोनों घर पहुंचे।  उसे बिठाकर चोर किसी काम के लिए बाहर चला गया। इसी बीच में उसकी दासी आयी और बोली , तुम यंहा क्यों आये हो ? चोर तुम्हे मार डालेगा।  भाग जाओ। 

राजा ने ऐसा ही किया।  फिर उसने फ़ौज लेकर चोर का घर घेर लिया।  जब चोर ने ये देखा तो वह लड़ने को तैयार हो गया।  दोनों में खूब लड़ाई हुई।  और अंत में चोर हार गया।  राजा ने उसे पकड़कर राजधानी में लाया और उसे सूली पर लटकाने का हुक्म दे दिया। 

संयोग से रत्नवती ने उसे देखा तो वह उस पर मोहित हो गयी।  पिता से बोली , मैं इसके साथ ब्याह करुँगी नहीं तो मर जाउंगी।     

पर राजा ने उसकी बात न मानी और चोर को सूली में लटका दिया।  सूली पर लटकने से पहले चोर तो बहुत रोया , फिर खूब  हंसा। रत्नवती वंहा पहुँच गयी और चोर के सर को लेकर सती होने को चिता में बैठ गयी।  उसी समय देवी ने आकाशवाणी की  , मैं तेरे पतिभक्ति से प्रसन्न हूँ।   जो चाहो सो मांग। 

रत्नवती  ने कहा , मेरे पिता के कोइ पुत्र नहीं है।  सो वर दीजिये , की उनके सौ पुत्र हो। 

देवी प्रकट होकर बोली यही होगा।  और कुछ मांगों।  वह बोली , मेरे पति जीवित हो जाएँ। 

देवी ने उसे जीवित कर दिया।  दोनों का विवाह हो गया।  राजा को जब यह मालूम हुआ तो उन्होंने चोर को अपना सेना पति बना लिया। 

इतनी कहानी सुनाकर बेताल ने पूछा , हे राजा विक्रम , यह बताओ की सूली पर लटकने से पहले चोर क्यों तो जोर - जोर से रोया और फिर क्यों हसतें -हसँते  मर गया। 

राजा ने कहा , रोया तो इसलिए  की वह राजा रत्नदत्त का कुछ भी भला न कर सकेगा। हँसा इसलिए की रत्नवती बड़े - बड़े राजाओ और धनिको को छोड़कर उस पर मुग्ध होकर मरने को तैयार हो गयी।  स्त्री के मन की गति को कोइ नहीं समझ सकता। 

इतना कहकर बेताल गायब हो गया और पेड़ पर जा लटका।  राजा फिर वंहा गया और उसे लेकर चला तो रास्ते में उसने यह कथा  कही। 









पार्ट - 15 

क्या चोरी की गयी चीज पर चोर का अधिकार होता ?





नेपाल देश में शिवपुरी नामक नगर में यशकेतु नामक राजा राज करता था।  उसके चन्द्रप्रभा नाम की रानी और शशिप्रभा नाम की लड़की थी। 

जब राजकुमारी बड़ी हुई तो एक दिन वसंत उत्सव देखने  बाग़ में गयी।  वंहा एक ब्राह्मण का लड़का आया हुआ था। दोनों  ने एक -दूसरे को देखा और प्रेम करने लगे।  इसी बीच एक पागल हाथी वंहा दौड़ता हुआ आया।  ब्राह्मण का लड़का राजकुमारी को उठा कर दूर  ले गया और हाथी से उसकी जान की रक्षा की।  इसके उपरांत राजकुमारी महल में चली गयी। पर ब्राह्मण के लड़के के लिए व्याकुल रहने लगी। 

उधर ब्राह्मण के लड़के की भी बुरी दशा थी।  वह एक सिद्धगुरु के पास पहुंचा और अपनी इच्छा बताई।  उसने एक योग - गुटिका अपने मुँह में रख कर ब्राह्मण का रूप बदल लिया और एक गुटिका ब्राह्मण के लड़के के मुँह में रखकर उसे एक सुन्दर लड़की बना दिया।  राजा के पास जाकर कहा , मेरा एक ही बेटा है।  उसके लिए मैं इस लड़की को लाया था।  पर लड़का न जाने कहाँ चला गया।  आप इसे यंहा रख ले।  मैं लड़के को ढूढ़ने जाता हूँ।  मिल जाने पर इसे ले जाऊंगा। 

सिद्धगुरु चला गया और लड़की के भेष में ब्राह्मण का लड़का राजकुमारी के पास रहने लगा।  धीरे -धीरे दोनों में बड़ा प्रेम हो गया।  एक दिन राजकुमारी ने कहा , मेरा दिल बड़ा दुखी रहता है।  एक ब्राह्मण के लड़के ने पागल हाथी से मेरे प्राण  बचाये थे।  मेरा मन उसी में रमा है। 

इतना सुनकर उसने गुटिका मुँह से निकाल ली और ब्राह्मण -कुमार बन गया।  राजकुमारी उसे देखकर बहुत खुश हुई।  उसके बाद तबसे वह रात को रोज गुटिका निकालकर लड़का बन जाता , दिन में लड़की बना रहता।  दोनों ने चुपचाप विवाह कर लिया। 

कुछ दिनों बाद राजा के साले की कन्या मृगांकदत्ता का विवाह दीवान के बेटे के साथ होना तय हुआ। राजकुमारी अपने कन्या - रूपधारी ब्राह्मण कुमार के साथ वंहा गयी।  संयोग से दीवान का पुत्र उस बनावटी कन्या पर रीझ गया। विवाह होने पर वह मृगांकदत्ता को घर तो ले गया लेकिन उसका हृदय उस कन्या के लिए व्याकुल रहने लगा उसकी यह हालत देख कर  दीवान हैरान हुआ।  उसने राजा को समाचार भेजा।  राजा आया।  उसके सामने सवाल था की धरोहर के रूप में रखी हुई कन्या को वह कैसे दे दे ?और दूसरी ओर यह मुश्किल अगर कन्या नहीं देता तो कंही दीवान  लड़का न मर जाये। 

बहुत सोच  विचार कर  के राजा ने बाद में दोनों का विवाह कर दिया।  बनावटी कन्या ने यह शर्त रखी थी की वह दूसरे के लिए लाई गयी थी।  इसलिए उसका यह पति छह महीने तक यात्रा करेगा , तब वह उससे बात करेगी। दीवान के लड़के ने यह शर्त मान ली। 

विवाह के बाद वह उसे मृगांकदत्ता के पास छोड़ कर तीर्थ यात्रा करने चला गया। उसके जाने के बाद दोनों आनंद से रहने लगे।  ब्राह्मण कुमार रात में आदमी बन जाता और दिन में कन्या बना रहता। 

जब छह महीने बीतने को आये तो वह एक दिन मृगांकदत्ता को लेकर भाग गया। 

उधर सिद्धगुरु एक दिन अपने मित्र शशि को युवा पुत्र बनाकर राजा के पास लाया और कन्या को माँगा।  शाप के डर  के मारे राजा ने कहा , वह कन्या तो जाने कहाँ चली गयी। आप मेरी कन्या से इसका विवाह कर दें। 

वह राजी हो गया और राजकुमारी का विवाह शशि के साथ कर दिया।  घर आने पर ब्राह्मण कुमार ने कहा ,यह राजकुमारी मेरी स्त्री है। मैंने इसे गंधर्व विवाह किया है। 

शशि ने कहा , यह मेरी स्त्री है , क्योंकि मैंने सबके सामने रीति -रिवाज विधि पूर्वक विवाह  किया है। 

बेताल ने पूछा ,  राजकुमारी दोनों में से किसकी पत्नी होनी चाहिए। 

राजा ने कहा , मेरी राय में वह शशि की पत्नी है। क्योंकि राजा ने सबके सामने विधिपूर्वक विवाह किया था।  ब्राह्मणकुमार ने तो चोरी से ब्याह किया था।  चोरी की चीज पर चोर का अधिकार नही होता है। 

इतना सुन ना  था की बेताल फिर गायब हो गया और राजा को फिर उसे पकड़ कर लाना पड़ा।  रस्ते में बेताल ने फिर एक कहानी सुनाई। 







पार्ट  - 16 
सबसे बड़ा काम किसने किया ?






हिमांचल पर्वत पर गन्धर्वो का एक नगर था , जिसमे जीमूतकेतु नामक राजा राज करता था।  उसके एक लड़का था।  जिसका नाम जीमूतवाहन था।  बाप -बेटे दोनों भले थे।  धर्म -कर्म में लगे रहते थे।  इससे प्रजा के  लोग स्वच्छंद हो गए  और एक दिन उन्होंने राजा के महल को घेर लिया।  राजकुमार ने यह देखा तो पिता से कहा की आप चिंता  न करो।  मैं सबको मार भगाऊंगा।  राजा बोला , नहीं , ऐसा मत करो युधिष्ठिर भी महाभारत करके पछताए थे। 


इसके बाद राजा अपने गोत्र के लोंगो को राज्य सौंप राजकुमार के साथ मलयाचल पर जाकर मडी बनाकर रहने लगा। वहाँ जीमूतवाहन की एक ऋषि के बेटे से दोस्ती हो गयी।  एक दिन दोनों पर्वत पर भवानी माता के मंदिर में गए तो दैवयोग से उन्हें मलयकेतु राजा की पुत्री मिली।  दोनों एक -दूसरे पर मोहित हो गए।  जब कन्या के पिता को मालूम हुआ तो उसने अपनी बेटी का विवाह उसके साथ कर दिया। 

एक रोज की बात है की जीमूतवाहन को पहाड़ पर एक सफ़ेद ढेर दिखाई दिया।  पूछा तो मालूम हुआ की पाताल से बहुत नाग आते है।  जिन्हे गरुण खा लेता है।  यह ढेर उन्ही की हड्डियों का है।  उसे देखकर जीमूतवाहन आगे बढ़ गया।  कुछ दूर जाने पर उसे किसी की रोने की आवाज सुनाई दी।  पास गया तो देखा एक बुढ़िया रो रही थी।  कारन  पूछा तो उसने बताया की आज उसके बेटे शंखचूर्ण नाग की बारी है। उसे आकर गरुण खा जायगा।  जीमूतवाहन ने कहा , माँ , तुम चिंता मत करो , मैं उसकी जगह चला जाऊंगा। बुढ़िया ने बहुत समझाया , पर वह न माना। 

इसके बाद गरुण आया और चोंच में पकड़कर उड़ा ले गया।  संयोग से राजकुमार का बाजूबंद गिर पड़ा , जिस पर राजा का नाम खुदा था।  राजकुमारी ने उसे देखा तो ,वह मूर्छित हो गयी।  होश आने पर उसने राजा और रानी को सब हाल सुनाया।  वे बड़े दुखी हुए और जीमूतवाहन को खोजने निकले।  तभी उन्हें शंखचूर्ण मिला। उसने गरुण को पुकार कर कहा , हे गरुण , तू इसे छोड़ दे।  बारी तो मेरी थी। 

गरुण ने राजकुमार से पूछा, तू अपनी जान क्यों दे रहा है ? उसने कहा , उत्तम पुरुष को हमेशा दुसरो की मदद करनी चाहिए।

यह सुनकर गरुण बहुत खुश हुआ उसने राजकुमार से वर मांगने को कहा।  जीमूतवाहन ने अनुरोध किया की सब सांपो को जिला दो।  गरुण ने ऐसा ही किया।  फिर उसने कहा , तुझे अपना राज्य भी मिल जायगा। 

इसके बाद वे लोग अपने नगर में लौट आये।  लोंगो ने राजा को फिर गद्दी पर बिठा दिया।  इतना कह कर बेताल बोला , हे राजन यह बताओ, इसमें सबसे बड़ा काम किसने किया ?

राजा ने कहा ,शंखचूर्ण ने 
बेताल ने पुछा , कैसे ?

 राजा बोला , जीमूतवाहन जाति का क्षत्री था। व्यायाम करने के लिए तालीम दी गई। लेकिन बड़ा काम तो शंखचूर्ण ने किया , जो गमुतवाहन को 

बहुत ज्यादा खराब होने पर फिर भी. फिर भी एक बार सुनाया गया। 


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