प्रारम्भ की कहानी ''( विक्रम - बेताल ),,,,,Beginning story" (Vikram - Betaal)
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| विक्रम और बेताल |
उस नगर में एक ब्राह्मण तपस्या करता था। एक दिन देवता प्रसन्न होकर उसे एक फल दिया और कहा ऐसे जो भी खायेगा वह अमर हो जायगा। ब्राह्मण ने वह फल लेकर अपनी पत्नी को दिया और देवता की कही हुई बात भी बता दी। ब्रहमनी बोली। हम अमर होकर क्या करंगे। जिन्दा रह जीवन भर भीख ही मांगते रहेंगे। इससे अच्छा तो मरना ठीक है। तुम इस फल को जाकर राजा को दे आओ और इसके बदले कुछ धन ले आओ।
यह सुन कर ब्राह्मण फल लेकर राजा भृतहरि के पास गया और सारा हाल सुनाया। भृतहरि ने फल लिया और उसके बदले ब्राह्मण को एक लाख रूपए देकर विदा कर दिया। भृतहरि अपनी रानी को बहुत चाहता था उसने वह फल जाकर रानी को दिया। रानी का संबंध शहर के कोतवाल के साथ थी,,तो कोतवाल को जाकर दे दिया। और कोतवाल शहर की वेश्या एक वेश्या के साथ था तो उसने वह फल जाकर उस वेश्या को जाकर दे दिया। वेश्या ने सोचा यह फल राजा को खाना चाहिए। वह फल लेकर राजा के पास गई और उसे दे दिया , राजा भृतहरि ने उसे खूब सारा धन दिया , जब राजा ने उस फल ध्यान से देखा तो उसे बहुत दुःख हुआ, पर उसने किसी से कुछ नहीं कहा और वह फल लेकर रानी के पास गया और उस फल के बारे में पूछा तो रानी ने जवाब दिया की मैंने उसे खा लिया है। राजा ने वह फल निकाल कर दिखा दिया। रानी घबरा गई और राजा को उसने सारी सच - सच बता दिया। भृतहरि ने भी पता लगाया तो उसे पूरी बात ठीक - ठीक मालूम हो गई. और उस बात से राजा को बहुत दुःख हुआ; उसने सोचा की इस दुनिया में सब माया - जाल है. इसमें कोई आपने नहीं है/ वह फल लेकर आया और उसे धुलवा कर स्वंम खा लिया। फिर राजपाठ छोड़ कर। योगी भेष बना कर जंगल में तपस्या करने चला गया। भृतहरि के \जंगल जाने से विक्रम की गद्दी सूनी हो गयी। जब राजा इंद्र को यह सुचना मिली तो उन्होंने एक दूत धारा नगरी की रखवाली के लिए भेज दिया। वह रात दिन वही रहने लगा और रखवारी करने लगा।
भृतहरि के राजपाठ छोड़कर वैन में चले जाने की सूचना जब राजा विक्रम को पता चला तो वह लौट कर अपने राज्य आया , जब वह आया तो आधी रात हो चुकी थी , जब वह नगरी में घुसने लगा तो उस देव ने उसे रोक लिया राजा विक्रम ने कहा यह मेरा राज है तुम कोन होते हो रोकने वाले।
देव ने बोला मुझे देवराज ने भेजा है , इस नगरी की रक्षा करने के लिए. अगर तुम राजा विक्रम हो तो मुझसे युद्ध करो।
दोनों में लड़ाई हुई। राजा ने जरा- सी देर में देव् को हरा दिया। तब देव् बोला, हे राजन। तुमने मुझे हरा दिया। मैं तुम्हे जीवन दान देता हूँ। इसके बाद देव ने कहा , राजन ' एक नगर और एक नक्षत्र में तुम तीन आदमी पैदा हुए थे। तुमने राजा के घर में जन्म लिया' और दूसरे ने तेली के और तीसरे ने कुम्हार के। तुम यहाँ राज करते हो' तेली पाताल में राज करता था। कुम्हार ने योग साधकर तेली को मारकर शमशान पिशाच बना कर सिरस के पेड़ से लटका दिया। अब तुम्हे वह मरने की फ़िराक में है। सावधान रहना।
इतना कह कर देव् चला गया और राजा महल में आ गया। राजा को वापस आया देख कर सभी को बड़ी ख़ुशी हुई। नगर में आनंद मनाया गया, राजा फिर राज करने लगा
एक दिन की बात है की शान्तिशील नाम का एक योगी राजा के पास दरबार में आया और एक फल देकर चला गया। राजा को आशंका हुई की देव् ने जिस आदमी को बताया था. कही यह वही तो नहीं है, यह सोच कर उसने वह फल नहीं खाया। उसने वह फल भंडारी को दे दिया। योगी आता और राजा को एक फल दे जाता।
संयोग से एक दिन राजा अपना अस्तबल देखने गया था. योगी वहां पहुंचा और राजा के हाथ में फल दे दिया। राजा ने उसे उछाला तो वह हाथ से छूट कर धरती में गिर पड़ा , उसी समय एक बन्दर ने झपट कर उसे उठा लिया। और तोड़ डाला , उसमे से एक लाल निकला जिसकी चमक से राजा की आंखे चौंधिया गयी। राजा को बड़ा अचरज हुआ. उसने योगी से पूछा आप यह लाल मुझे रोज क्यों दे जाते है।
योगी ने जवाब दिया , महाराज; राजा , गुरु, ज्योतिषी,वैध और बेटी के पास कभी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए।
राजा ने भंडारी के के यहाँ से पिछले सरे फल मंगवाए। तुड़वाने में सबमे एक - एक लाल निकला। राजा इतने सरे लाल देख कर बहूत खुश हुआ। उसने जौहरी को बुलवा कर उनका मूल्य पूछा। जौहरी बोला ' महाराज , ये लाल इतने कीमती है की इनका मोल करोडो रूपए में भी नहीं आका जा सकता। एक -एक लाल एक -एक राज्य के बराबर है।
यह सुन कर राजा योगी का हाथ पकड़ कर गद्दी में ले गया''' और बोला ,योगीराज , आप सुनी हुई बातें ,और दुसरो के सामने नहीं जाती।''
राजा उसे अकेले में ले गया। वंहा जाकर योगी ने कहा , महाराज , बात यह है की गोदावरी नदी किनारे मसान में मैं एक मंत्र सिद्ध कर रहा हूँ। उसके सिद्ध हो जाने से मेरा मनोरथ सिद्ध हो जायगा। तुम एक रात मेरे पास रहोगे तो मंत्र सिद्ध हो जायगा। एक दिन को हथियार बाँध कर तुम मेरे पास आ जाना।
राजा ने कहा'' अच्छी बात है
इसके बाद योगी दिन और समय बता कर आपने मठ में वापस चला गया। समय के अनुसार राजा वह दिन अकेला वंहा पंहुचा। योगी ने उसे अपने पास उसे बैठा लिया। थोड़ी देर बैठकर राजा ने पूछा , महाराज मेरे लिए क्या आज्ञा है।
योगी ने कहा राजन'' यंहा से दक्षिण दिशा की ओर में दो कोस की दुरी पर मशान में सिरस के पेड़ पर मुर्दा लटका है। उसे मेरे पास ले आओ ,तब तक मैं यंहा पूजा करता हूँ।
यह सुन कर राजा वंहा से चल दिया। बड़ी भयंकर रात थी। चारो तरफ अंधेरा था। पानी बरस रहा था। भूत प्रेत शोर मचा रहे थे. सांप पैरो में लिपट रहे थे। लेकिन राजा हिम्मत से आगे बढ़ रहा था। जब वह शमशान में पंहुचा तो देखता क्या है की शेर दहाड़ रहे हैं। हाथी चिघ्घाङ रहे है। भूत प्रेत आदमियों को मार रहे है. राजा बेधड़क चलता रहा और सिरस के पेड़ के पास पहुंच गया। पेड़ जड़ से फुनगी तक आग से दहक़ रहा था। राजा ने सोचा,,,,,,,,,,,,,, हो -या न हो यह वही योगी है। जिसके बारे में देव् ने बताया था। रस्सी में बंधा पेड़ पर एक मुर्दा लटक रहा था.राजा पेड़ पर चढ़ गया और तलवार से उस रस्सी को काट दिया। मुर्दा नीचे गिर पड़ा और दहाड़ मार कर रोने लगा।
राजा ने नीचे आकर पूछा '' कोन है तू
राजा का इतना कहना था की वह मुर्दा खिल - खिलाकर हँस पड़ा. राजा को बड़ा अचरज हुआ'' तभी वह मुर्दा फिर पेड़ पर जा लटका। राजा फिर ऊपर चढ़ कर गया और रस्सी काट कर मुर्दे को बगल में दबा लिया। और नीचे ले आया।बोला बता''' तू कौन है
मुर्दा चुप रहा.......
तब राजा ने उसे एक चादर में बाँधा और योगी के पास ले चला. रास्ते में वह मुर्दा बोला मैं बेताल ह '' तू कौन है और मुझे कहाँ लिए जा रहा है।
राजा ने कहा मैं विक्रम हूँ '' मैं धारा नगरी का राजा हूँ। मैं तुझे योगी के पास लिए जा रहा हूँ। बेताल बोला मैं तेरे साथ एक शर्त पर चलूँगा। अगर तू रास्ते में बोलेगा तो ,मैं वापस पेड पर जा लटकुँगा''.
राजा ने उसकी बात मन ली , '' फिर बेताल बोला पंडित , चतुर और ज्ञानी , इनके दिन अच्छी -अच्छी बातो में बीतते हैं , जबकि मूर्खो के दिन कलह और नींद में.. अच्छा होगा की हमारी रह भली बातों की चर्चा में बीत जाये। ल मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूँ। ले सुन '''' . ..

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